(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.113. अध्यायः 113
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति बलवच्छत्रुवशीकरणे विनयस्योपायतायां दृष्टान्ततया सरित्सागरसंवादानुवादः॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

युधिष्ठिर उवाच। 12-113-0x(5647)(69230)
राजा राज्यमनुप्राप्य दुर्बलो भरतर्षभ।
अमित्रस्यातिवृद्धस्य कथं तिष्ठेदसाधनः॥ 12-113-1(69231)
भीष्म उवाच। 12-113-2x(5648)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
सरितां चैव संवादं सागरस्य च भारत॥ 12-113-2(69232)
सुरारिनिलयः शश्वत्सागरः सरितां पतिः।
पप्रच्छ सरितः सर्वाः संशयं जातमात्मनः॥ 12-113-3(69233)
सागर उवाच। 12-113-4x(5649)
समूलशाखान्पश्यामि निहतान्क्वापि नो द्रुमान्।
युष्माभिरिह पूर्णाभिरन्यांस्तत्र न वेतसान्॥ 12-113-4(69234)
अ-पकायश्चाल्पसारो वेतसः कूलजश्च यः।
अज्ञया वा नानीतः किं च वा तेन वः कृतम्॥ 12-113-5(69235)
तदहं श्रोतुमिच्छामि सर्वासामेव वो मतम्।
यथा चेमानि कूलानि हित्वा नायाति वेतसः॥ 12-113-6(69236)
तत्र प्राह नदी गङ्गा वाक्यमुत्तरमर्थवत्।
हेतुमद्ग्राहकं चैव सागरं सरितां पतिम्॥ 12-113-7(69237)
गङ्गोवाच। 12-113-8x(5650)
तिष्ठन्त्येते यथास्थानं नगा ह्येकनिकेतनाः।
ततस्त्यजन्ति तत्स्थानं प्रातिलोम्यान्न वेतसः॥ 12-113-8(69238)
वेतसो वेगमायान्तं दृष्ट्वा नमति नापरे।
स च वेगे ह्यतिक्रान्ते स्थानमापद्यते पुनः॥ 12-113-9(69239)
कालज्ञः समयज्ञश्च सदावश्यश्च नो द्रुमः।
अनुलोमवृत्तितस्तब्धस्तेन त्वां नैति वेतसः॥ 12-113-10(69240)
मारुतोदकवेगेन ये नमन्त्युन्नमन्ति च।
ओषध्यः पादपा गुल्मा न ते यान्ति पराभवम्॥ 12-113-11(69241)
भीष्म उवाच। 12-113-12x(5651)
यो हि शत्रोर्विवृद्धस्य प्रभोर्बन्धविनाशने।
पूर्वं न सहते वेगं क्षिप्रमेव विनश्यति॥ 12-113-12(69242)
सारासारं बलं वीर्यमात्मनो द्विषतश्च यः।
जानन्विचरति प्राज्ञो न स याति पराभवम्॥ 12-113-13(69243)
एवमेव यदा विद्वान्मन्यते विपुलं बलम्।
संश्रयेद्वैतसीं वृत्तिमेतत्प्रज्ञानलक्षणम्॥ ॥ 12-113-14(69244)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मपर्वणि त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः॥ 113॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-113-4 निहतानुन्मूलितान्। कायिन इति पाठे महाशरीरान्। अन्यानल्पशरीरान्वेतसान् न हतान्पश्यामि॥ 12-113-5 अवज्ञाय न शक्यो वा इति द. पाठः॥ 12-113-8 एकनिकेतनाः स्तब्धा इत्यर्थः। प्रातिलोम्यादस्माकं प्रातिकूल्यात्॥ 12-113-14 वैतसीं वृत्तिमस्तब्धत्वम्॥


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